किसानों की दयनीय स्थिति का कारण और उपाय

(The Reason and Solution of Farmers' Compassionate Status)

 

Dr. Alok Pandey

Assistant Professor, Department of Geography, Allahabad degree College, Allahabad University, Allahabad-211001

*Corresponding Author E-mail:  alokpandeygeog@gmail.com

 

सारांश

किसानों की दयनीय स्थिति की समस्या से भारत ही नहीं, पूरी दुनिया किसी किसी रूप में इससे दो-चार हो रही है। पश्चिम के देश विश्व व्यापार संगठन से जूझते हुए कृषि को सब्सिडी के बल पर चला रहे हैं तो चीन जैसे देश कुछ अलग तरह के समाधान की तरफ बढ़ रहे हैं। तेज रफ्तार से भाग रहे उद्योगों के बीच कृषि को किस तरह आगे ले जाया जाए, यह सभी की समस्या है। हमारी समस्या यह है कि देश की तकरीबन आधी आबादी इस संकट ग्रस्त कारोबार से जुड़ी है, लेकिन हम दीर्घकालिक समाधान खोजने के बजाय अभी तात्कालिक राहत की राह पर ही हैं।

खेती के नये तरीके नई तकनीक और इनोवेशन किसानों की किस्मत उनकी आर्थिक दशा को काफी हद तक बदल सकते हैं। केन्द्र सरकार ने साल 2022 तक किसानों की आय को दोगुना करने का एक चुनौतीपूर्ण अभियान शुरू किया है। तमाम तरह की रणनीति बनाने के प्रस्ताव दिये जा रहें हैं। पर हमें एक ऐसा माहौल बनाना चाहिए जिसमें किसानों में प्रगतिशील सोच विकसित हो और वे अपनी फसलों पर ऊँचा मुनाफा पा सकें।

शब्दकुंजी & कृषि की वर्तमान स्थिति, किसानों और संगठित क्षेत्र के कामगारों की आय का तुलनात्मक अध्ययन, किसानों की स्थिति में सुधार का सुझाव।

 

 


 

1. प्रस्तावनाः

भारत गाँवों का देश है। भारत की आत्मा गाँवों और किसानों में बसती है। इसलिए भारत एक कृषि प्रधान देश कहलाता है। यहाँ की 70-80 प्रतिशत जनता प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर है। किसान हमारे लिए अन्न, फल, सब्जियाँ आदि उपजाता है, वह पशुपालन भी करता है। लेकिन भारतीय किसान की आर्थिक स्थिति दयनीय है। स्वतन्त्रता के 68 वर्षों के बाद भी वह गरीब, अशिक्षित और शक्तिहीन है। वह दिन रात मेहनत करता है उसके परिवार के लोग भी दिन-रात खेत-खलिहान में जुटे रहते हैं फिर भी वह अपने बाल-बच्चों का पेट ठीक से नहीं भर पाता है। हमारे स्वर्गीय प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने हमेंजय किसान जय जवानका नारा दिया था। यह हमारे किसानों के महत्व को रेखांकित करता है परन्तु अभी भी उनकी हालत दयनीय है।

 

वर्ष 2016-17 के आर्थिक सर्वेक्षण की रिर्पोट के अनुसार देश के 17 राज्यों में किसानों परिवारों की औसत आय सालाना 20,000 रूपये है जो देश के औसत आय के लगभग आधी है। स्टेट आॅफ इंडियन एग्रीकल्चर (2015-16) की रिपोर्ट यह बताती है कि एक तरफ जहाँ देश में खाद्यान्न का उत्पादन बढ़ रहा है वहीं दूसरी तरफ इसका फायदा किसानों को नहीं मिल रहा है। इस रिपोर्ट के अनुसार देश में सीमांत आकार के जोतों की संख्या बढ़ रही है यानि खेत सिकुड़ रहे हैं और किसान खेती के सहारे घर नहीं चला पा रहे हैं। देश में 2001 में जोतों की संख्या 75.41 मिलियन थी जो वर्तमान में 92.83 मिलियन हो गयी है। नेशनल सर्वे रिर्पोट के अनुसार देश के 9 करोड़ किसान परिवारों में लगभग छः करोड़ किसानों के पास एक हेक्टेयर से कम खेती के योग्य जमीन है। इस रिर्पोट के आधार पर परिवार की महीने की आमदनी मुश्किल से पाँच हजार से लेकर छः हजार रूपये होती है। इन सरकारी रिर्पोट और किसानों के हालात को समझेंगे तो पायेंगे किसानों की आमदनी वर्षों से ठहरी हुई है।

 

जब हम किसानों की दयनीय स्थिति के बारे में अध्ययन करते हैं तो हमें किसान और खेती की मूल समस्या, कृषि उत्पादों का उचित मूल्य मिलना है। यदि हम किसान और सरकारी कर्मचारी के आय की तुलना करें तो हम देखते हैं 1970 में गेहूँ 76 रूपये कुंटल था और 2015 में करीब 1450 रूपये कुंटल, यानि सिर्फ 19 गुना, जबकि इस दौरान सरकारी कर्मचारी के मूल वेतन और डीए 120 गुना बढ़ा, जबकि प्रथम वर्ग की सेवाओं में यह वृद्धि 150-170 गुना और कारपोरेट सेक्टर में यह बढ़ोत्तरी 300 से 1000 गुना थी, अगर इस अनुपात में किसान की तुलना करें तो गेहूँ कम से कम 7600 रूपये कुंटल होना चाहिए।

जब हम अस्सी के दशक में कीमतों की बात करते हैं तो देखते हैं कि गेहूँ एक रूपये किलो, दूध एक रूपया लीटर और देसी घी 5 रूपया किलो था। उस वक्त चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी की तनख्वाह 80 रूपये और प्राथमिक विद्यालय के अध्यापक का मूल वेतन 195 रूपये था। जब हम आज की बात करते हैं तो देखते हैं कि चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी को कम से कम 20,000 रूपये और प्राथमिक विद्यालय के अध्यापक को 35,000 रूपये मिलते हैं जबकि प्रथम श्रेणी के सरकारी कर्मचारियों की तनख्वाह और तेजी से बढ़ी है जबकि गेहूं का सरकारी मूल्य 16 रूपये 25 पैसे ही है। 37 साल में सरकारी नौकर की सैलरी में कम से कम 150 गुना बढ़ोत्तरी हुई जबकि गेहूँ की कीमत 16 गुना ही बढ़ी। जबकि इस दौरान 1 रूपया लीटर वाला डीजल 60 रूपया लीटर बिक रहा है और 2-3 रूपये वाली मजदूरी 200 रूपये प्रतिदिन हो गई है यानि किसान का खर्च तेजी से बढ़ा लेकिन बाकी लोगों के अनुपात में उस उपज की सही कीमत नहीं मिली।

 

न्यूनतम समर्थन मूल्य से मतलब उस रेट से होता है, जो सरकार किसी खाद्यान्न (गेहूं-धान आदि) के बदले किसी किसान को भुगतान की गारंटी देती है। सरकार ने गेहूं धान गन्ना समेत कई चीजों का एम एस पी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) तय भी कर रखा है लेकिन वो किसान की लागत के बदले काफी कम है, जिसे लेकर पिछले कई वर्षों से किसान आंदोलनरत हैं। ‘‘किसानों की आमदनी तो छोड़िए अपनी फसल का लागत तक निकालना मुश्किल हो रहा है। कृषि उत्पाद की उपभोक्ता के स्तर पर कीमत और किसान के स्तर पर लागू कीमत में 50 से 300 प्रतिशत तक का अंत़र है।

 

इन दिनों इलाहाबाद में प्याज 40 रूपये किलो बिक रही है। जबकि पिछले दिनों इंदौर में प्याज 50 पैसे किलो तक बिका इसी तरह महाराष्ट्र के नागपुर में बाग मालिकों को संतरा माटी के मूल्य बहाना पड़ा, 0प्र0 के में किसानों ने आलू को लखनऊ में राजभवन के सामने सड़कों पर बिछादिया। किसानों के अनुसार प्याज की लागत कम से कम साढ़े चार रूपये आती है और किसान जब उसे 50 पैसे में बेचेगा तो सड़क पर तो उतरेगा ही।

 

 

मैग्सेसे पुरस्कार विजेता पी0 साईंनाथ कहते हैं किकिसान की आमदनी का जरिया बहुत अनिश्चित है। उसकी आमदनी को आप किसी दूसरे पेशे से जोड़कर देखेंगे तो साफ हो जायेगा कि खेती में आमदनी बहुत कम है

 

प्रसिद्ध कृषि वैज्ञानिक देश में हरित क्रान्ति के जनक एवं राष्ट्रीय किसान आयोग के अध्यक्ष डाॅ0 एम0 एस0 स्वामीनाथन ने तो यहाँ तक कहा कि ‘‘कृषि से भी ज्यादा ध्यान अब किसानों पर दिया जाना चाहिए, किसानों की वास्तविक आय, यदि बढ़ी तो कृषि विकास का रास्ता स्वतः ही तैयार हो जायेगा’’ यदि देश के किसान खुशहाल होंगे, तो मुल्क में और सबका कारोबार भी सही चलेगा, अन्ततः तो देश का भविष्य एक मजबूत कृषि उत्पादन प्रबन्धन की श्रेष्ठ तकनीकों एवं बेहतर जननीतियों के सशक्त तालमेल से हासिल किया जा सकता है।

 

पंजाब कृषि विश्वविद्यालय और साल 2011 में आई जनगणना की रिर्पोट के अनुसार हर रोज ढाई हजार किसान खेती छोड़ रहे हैं। कुछ साल पहले आई सरकार की एक रिर्पोट में खुलासा हुआ था कि अगर मौका मिले तो देश के 50 फीसदी किसान खेती छोड़ना चाहेंगे।

 

 

देश के प्रथम प्रधानमंत्री पण्डित जवाहर लाल नेहरू ने वर्ष 1948 में कृषि के महत्व को देखते हुए कहा था, ‘सब कुछ इन्तजार कर सकता है, पर कृषि नहीं’ ;म्अमतलजीपदह मसेम बंद ूंपजए इनज दवज ।हतपबनसजनतमद्ध पर इसे दुर्भाग्य ही कहेंगे कि कृषि में राष्ट्रीय नीति बनाने और लागू करने में उद्योगों की तुलना में कृषि को ज्यादा प्रतीक्षा करना पड़ा। वर्तमान समय में किसानों के उत्पादों का उचित मूल्य दिलाने के लिए सरकार के द्वारा फसलोें का न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारित किया जाता है। किसानों को इसका लाभ मिले, सरकार को इसका उचित प्रबन्ध करना चाहिए, क्योंकि सरकारी खरीद केन्द्रों की संख्या बहुत कम है, किसान 70-80 फीसदी गेहूँ फुटकर आढ़तियों को बेचता है आज भले गेहूँ का मूल्य 1625 रू0 (2016-17) हो लेकिन गाँवों में 1200 से 1400 में बिका है। पैसे वाले भंडारण करते हैं और फिर पाँच-छः महीने में यही गेहूँ 1800 में आसानी से बेचेंगे तो इन बिचैलियों को खत्म किये बिना किसान का भला नहीं हो सकता।

 

लेखक के द्वारा उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले के लम्भुआ तहसील के महादेवा गाँव के व्यक्तिगत सर्वे के आधार पर गेहूँ के उत्पादन लागत और आय में बहुत कम अन्तर देखने को मिला।

 

व्यक्तिगत सर्वे के आधार पर इस बात की पुष्टि होती है कि सरकारी खरीद केन्द्र पर गेहूँ बेचने पर किसान को कुल 11605 रू0 की आय होती है जबकि फुटकर आढ़त पर बेचने पर किसान को कुल आय 5980 रू0 प्रति हेक्टेयर प्राप्त होती है। जो प्रति व्यक्ति राष्ट्रीय किसान आय से भी कम है। इस प्रकार एक किसान को छः माह में मात्र 11605 रू0 की प्राप्ति होती है। इतने कम पैसे में परिवार का भरण-पोषण असम्भव हो जाता है और किसान खेती छोड़ने के लिए मजबूर हो जाता ळें

 

हाल ही में तेलंगाना की सरकार ने सूबे के हर किसान को 8,000 रूपये सालाना आर्थिक मदद देने का प्रावधान किया है। उम्मीद थी कि इस वर्ष के बजट (2017-18) में यह  माडल देश भर में लागू किया जायेगा और सभी किसानों के लिए ऐसी ही घोषणा की जायेगी। लेकिन सरकार का इसके प्रति  उदासीन रहना उसके किसान-हितैषी होने की पोल खोलता है। आज किसान कर्ज की बोझ से कराह रहा है। खुद सरकार ने संसद में माना है कि हमारे अन्नदाताओं पर 14.5 लाख करोड़ रूपये के ऋण हैं। ऐसे में कर्ज माफी नही तो कम से कम किसानों के लिए मासिक या सलाना आमदनी की कोई व्यवस्था करनी चाहिए थी। ऐसा करना जरूरी भी है, क्योंकि 2016 का आर्थिक सर्वे बताता है कि देश में आधे किसान परिवारों की औसत आमदनी 20 हजार रूपये सालाना है। जाहिर है, उन्हें आठ हजार रूपये सालाना की अतिरिक्त मदद से काफी  राहत मिलती।

 

वर्तमान समय में सरकार के द्वारा किसानों की आय दुगुनी करने की बात की जा रही है। ताजा अन्तर्राष्ट्रीय सर्वेक्षणों के अनुसार देश के जिन लोगों की आय एक प्रतिशत या कम बढ़ी है उनमें अधिकाँश किसान और मजदूर हैं, जो अनेक नई पुरानी शासकीय योजनाओं के बावजूद उतने ही अभावग्रस्त हैं जैसा पहले थे। उनका आमदनी बढ़ाने का कोई स्पष्ट पारदर्शी और प्रमाणिक तरीका सफल नहीं हो पाया है।

 

खेती, खाद्यान्न, किसान एवं कृषि मजदूरों की समस्या आज स्वतन्त्रता प्राप्ति के शुरूआती दशकों से अलग है। हरित क्रान्ति के हाइब्रिड बीजों, सिंचाई साधनों के विस्तार और रासायनिक खादों कीटनाशकों के प्रयोग ने कृषि उपज इतनी बढ़ा दी कि खाद्यान्न सुरक्षा बड़ी चुनौती नहीं रह गई। आज कृषि क्षेत्र की असली चुनौती कृषि पैदावार और बाजार भाव में अनिश्चय की स्थिति और उत्पादों का सही भंडारण कृषि उत्पादों की बिक्री के लिए स्थानीय विपणन नेटवर्क का उपलब्ध होना है। जलवायु परिवर्तन और बढ़ती मंहगाई के दौर में किसानों को खेती से पर्याप्त आय मिल पाने से लोग खेती-बारी से दूर होते जा रहे हैं।

 

कृषि में उन्नत तकनीकि के प्रयोग मात्र से किसानों की आय दुगना करना संभव नहीं है। हालांकि ग्रीन हाउस, पाली हाउस नेट हाउसों वाली संरक्षित कृषि, बहुमंजली खेती, ड्रिप इरिगेशन वाली खेती तथा अलग-अलग मौसम वाले बीजों की आवश्यकता तथा सौर ऊर्जा से संचालित उपकरण कृषि लागत घटा सकते हैं। ये उपाय कृषि उत्पादन की अनिश्चितता कम कर, प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण में मददगार बन सकते हैं, लेकिन तब जब उत्पादक से उपभोक्ता तक विपणन का सही नेटवर्क बन पाए।

 

इस वर्ष (2017-18)  के बजट में सरकार का पूरा ध्यान किसानों पर है, और वहईज आॅफ लिविंगयानी ग्रामीण रहन सहन को बेहत बनाने पर खासा जोर दे रही है। किसानों को भरोसा दिया गया है कि साल 2022 तक उनकी आय दुगनी हो जायेगी। खरीफ फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य  डेढ़ गुना करने, आलू-टमाटर-प्याज के लिएआपरेशन ग्रीनशुरू करने जैसी घोषणाएं भी की गई हैं। इसी वर्ष देश भर में 22 हजार हाट को कृषि बाजार बनाने की बात कही गई हैं। किसानों को इसकी काफी जरूरत थी। बाजार बढ़़ने का अर्थ है, किसानों के लिए अपने उत्पाद बेचने की नई जगह का होना। इससे ज्यादा खरीदार उन तक पहुँच सकेंगे।

 

प्रबंधन तंत्र के विकास का लाभ कृषि क्षेत्र को सबसे कम मिला है। कृषि में लगने वाली उन्नति तकनीकि और मशीनों की मार्केटिंग का उचित ढ़ांचा माहौल बना, कृषि उत्पादों की व्यापक मार्केटिंग के लिए मार्केटिंग प्रबंधन के नये ज्ञान का पर्याप्त रूप से इस्तेमाल किया जा सका है। किसानों की आय बढ़ाने, कृषि उपज को बाजार की जरूरतों के अनुसार नियंत्रित करने के लिए नई तकनीकि से भी ज्यादा जरूरी स्थानीय विपणन नेटवर्क, मुख्य बाजार बड़े शहरों से कृषि उत्पादों को जोड़ना है। कृषि उत्पादों की छंटाई, पैकिंग, सप्लाई चेन अल्पकालीन भण्डारण को लेकर गाँवों-कस्बों के युवा नए स्टार्टअप बना सकते हैं। उन्हें उचित ज्ञान, प्रोत्साहन संरक्षण की जरूरत है।

 

सन्दर्भ-ग्रन्थः

·        India, Ministry of Agriculture (2014) Agriculture Statistics at a Glance, Ministry of Agriculture, New Delhi.

·        India, Ministry of Agriculture (2012) All India Report on Inputs Survey, Ministry of Agriculture & Farmer Welfare, New Delhi.

·        Economic Survey – 2017-18

·        Yojana, (2017) Tranforming India, May- 2017

·        Kurukshetra (2017) 'A journal on Rural development'Transforming Rural India Vol. 65 No. 7 May.       

·        Kurukshetra (2016) 'A journal on Rural Development' Rural Infrastructure Vol.65 No. 2 December.

     व्यक्तिगत सर्वे एवं लेखक के विचार

 

 

 

Received on 20.02.2017       Modified on 12.03.2017

Accepted on 25.03.2017      © A&V Publication all right reserved

Int. J. Ad. Social Sciences. 2018; 6(1):11-16.